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प्रमाणम्।]] (pramANam|]])

 
कृदन्तरूपमाला
Sanskrit
1 {@“मुज शब्दार्थः”@} 2 3 ‘मज मुजि’ इति क्षीरस्वामी, चन्द्रश्च।
‘मृज मृजीत्यप्याहुः’ इति पुरुषकारः 4।
क्षीरतरङ्गिण्यां तु ‘मृज मृजीत्यप्याहुः’ इति पाठ उपलभ्यते।
“मुद्रिते चान्द्रधातुपाठे तु ‘मुज मुजि’ इति पाठ उपलभ्यते 5” इति क्षी।
टीका।
माधवीयधातुवृत्तौ तु स्वामिचन्द्रयोर्मते ‘मृज मृजीति’ पाठः प्रदर्शितः।
मूलशुद्धिस्त्वत्र कीदृशीति विद्मः।
युक्तायुक्तत्वे त्वत्र सूरयः प्रमाणम्।]] मोजकः-जिका, मोजकः-जिका, मुमोजिषकः-मुमुजिषकः-षिका, मोमुजकः-जिका
मोजिता-त्री, मोजयिता-त्री, मुमोजिषिता-मुमुजिषिता-त्री, मोमुजिता-त्री
इत्यादीनि रूपाणि सर्वाणि भौवादिककुचधातुवत् 6 ज्ञेयानि।
यङ्लुकि शता-मोमुजन् 7 इति।
8 मुजितम् अनेनमोजितम्, इति वा।
9
प्रासङ्गिक्यः
01
=>
(१२७६)
02
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(१-भ्वादिः-२५०। अक। सेट्। पर।)
03
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[[[अ]
04
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(श्लो। ५९)
05
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(चा। धा। सू। १-८०)
06
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(२००)
07
=>
[[आ। ‘गर्जत्खरं गृञ्जितधेनुमोमुजद्वत्सोत्करं मुञ्जदजं वजन् व्रजम्।।’ धा। का। १-३३।]]
08
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[[४। निष्ठायाम् ‘उदुपधात्--’ (१-२-२१) इति कित्त्वविकल्पनात् रूपद्वयम्।]]
09
=>
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